विद्युत से जुड़े कुछ शब्द | Electricity related words in Hindi

विद्युत से जुड़ी शब्दावली | Electricity related words in Hindi

आज के इस पोस्ट में विद्युत् से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली के बारे में जानेंगे ,जो हमारी दैनिक दिनचर्या में कभी न कभी उपयोग में आते रहते हैं , विद्युत से जुड़े शब्दों से भी प्रश्न विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं.वर्तमान अधिकतर काम विद्युत पर आश्रित हो गया है क्यूंकि आधिकतर कामों के लिए मशीन का उपयोग किया जा रहा है ,जो विद्युत् से ही चलती हैं. इसलिए  विद्युत से जुड़े शब्दों के बारे में जानना जरुरी है.विद्युत से जुड़े शब्दों को जानने के लिए पोस्ट को पूरा जरुर पढ़ें.

विद्युत: विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है।अर्थात् इसे न तो देखा जा सकता है व न ही छुआ जा सकता है केवल इसके प्रभाव के माध्यम से महसुस किया जा सकता है।

विद्युत दो प्रकार की होती है –

  1. स्थिर विद्युत (Static Electricity)
  2. गतिशिल विद्युत (Dynamic Electricity)

विद्युत क्षेत्रः किसी विद्युत आवेश के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ पर विद्युत का अनुभव हो।

विद्युत विभव: किसी इकाई धनावेश को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जितना कार्य करना पड़ता है उसे उस बिन्दु का विद्युत विभव (electric potential ) कहते हैं। विद्युत विभव की अन्तर्राष्ट्रीय इकाई वोल्ट है।

विद्युत आवेश: विद्युत आवेश कुछ उपपरमाणवीय कणों में एक मूल गुण है जो विद्युतचुम्बकत्व का महत्व है। आवेशित पदार्थ को विद्युत क्षेत्र का असर पड़ता है और वह ख़ुद एक विद्युत क्षेत्र का स्रोत हो सकता है।

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विद्युत चालन: किसी संचरण माध्यम से होकर आवेशित कणों के प्रवाह को विद्युत चालन कहते हैं। आवेशों के प्रवाह से विद्युत धारा बनती है।

डायनेमोः ऐसी मशीन, जिसके द्वारा यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिणित किया जाता है।

आवेश : सर्वप्रथम बेंजामिन फ्रेंकलिन ने धनात्मक व ऋणात्मक आवेश नाम दिया। वह आवेश जो कांच को रेशम से रगड़ने पर छड़ पर संचित होता है धनावेश तथा जो आवेश एबोनाइट पर बिल्ली की खाल से रगड़ने पर संचित होता है ऋणावेश कहा गया। 

वस्तुओं में आवेश इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण से आता है। इसमें प्रोट्रॉन आभा नहीं लेते हैं। जब किसी वस्तु पर इलेक्ट्रॉनों की कमी होती है तो उस पर धनावेश और जब इलेक्ट्रॉनों की अधिकता होती है जो उस पर ऋण आवेश आता है। 

तड़ित चालकः इसका प्रयोग भवनों की सुरक्षा हेतु किया जाता है। इसका ऊपरी नुकीला सिरा बादलों से प्राप्त आवेश को ग्रहण कर पृथ्वी में भेजकर भवनों को सुरक्षित कर देता है। 

विद्युत धारा : आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। ठोस चालकों में विद्युत धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण के कारण, जबकि द्रवों में व गैसों में आयनों की गति के कारण होता है। 

विद्युत धारा की दिशा धनावेश के गति की ओर तथा ऋणावेश के गति की विपरीत दिशा में मानी जाती है। विद्युत धारा का मात्रक एम्पियर (A) है। 

जब किसी परिपथ में धारा एक ही दिशा में बहती हैं तो उसे दिष्ट धारा और यदि धारा की दिशा लगातार बदलती है तो उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं। 

विभवान्तरः किसी तार में धारा प्रवाहित करने पर मुक्त इलेक्ट्रॉन गति करते हुए चालक के परमाणुओं से टकराते रहते हैं। इससे इनकी गति में अवरोध उत्पन्न होता है और इलेक्ट्रॉन इस अवरोध के विरुद्ध अपनी गति को बनाये रखने हेतु जो कार्य करता है उसे विभवान्तर कहते हैं। इसका मात्रक वोल्ट है

विद्युत सेलः विद्युत सेल में रासायनिक क्रियाओं से रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इनमें धातु की दो छड़ें होती हैं धनावेश को एनोड व ऋणावेश को कैथोड कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं प्राथमिक एवं द्वितीयक सेल।

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प्राथमिक सेल रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है, जैसे-वोल्टीय, लेक्लांशे एवं डेनियल सेल। 

द्वितीयक सेल पहले विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका प्रयोग कार, ट्रक, ट्रैक्टर आदि में किया जाता है।

वोल्टीय सेल : आविष्कार 1799 में एलिजाण्डों वोल्टा ने किया था कांच के बर्तन में सल्फ्यूरिक अम्ल भरा रहता है, जिसमें एक जस्ते की (कैथोड़) तथा एक ताँबे (एनोड़) की छड़ डूबी रहती है। 

लेक्लांशे सेल : कांच के बर्तन में अमोनियम क्लोराइड़ (नौसादर) का संतृप्त विलयन भरा रहता है। इसमें जस्ता (कैथोड़) डूबा रहता हैकार्बन की छड़ (एनोड़) मैगनीज डाइ-आक्साइड व कार्बन के मिश्रण के बीच रखी रहती है।

इसका प्रयोग वहाँ किया जाता है जहां रुक-रुक कर विद्युत धारा की आवश्यकता होती है, जैसे-विद्युत घंटी, टेलीफोन आदि। 

शुष्क सेल : इस सेल में जस्ते के बर्तन में मैगनीज डाइ-आक्साइड़ नौसादर व कार्बन का मिश्रण भरा होता है, जिसके बीच रखी कार्बन की छड़ एनोड़ का कार्य करती है और जस्ते का बर्तन कैथोड़ का कार्य करता है। इस सेल का विद्युत वाहक बल 1.5 वोल्ट होता है। इसका प्रयोग टार्च, रेडियो, टेपरिकॉर्डर आदि में होता है।

प्रतिरोधः किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर गतिशील इलेक्ट्रॉन रास्ते में आने वाले परमाणुओं से टकराते रहते हैं, जिससे ऊर्जा का ह्रास होता है। धारा प्रवाह में उत्पन्न इस व्यवधान को ही प्रतिरोध कहते हैं। इसका मात्रक ओम है। 

अमीटरः विद्युत धारा को एम्पियर में मापने वाला यंत्र है इसे परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ते हैं। आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है।

वोल्टमीटर : इसका प्रयोग परिपथ में दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर मापने हेतु किया जाता है इसे भी समान्तर लगाते हैं। आदर्श वोल्ट मीटर का प्रतिरोध अन्नत होना चाहिए, जिससे परिपथ में प्रवाहित धारा में कोई परिवर्तन न हो।

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विद्युत फ्यूजः परिपथ में लगे उपकरणों की सुरक्षा हेतु प्रयुक्त होता है यह तांबा, टिन एवं सीसा की मिश्र धातु से बना होता है। यह कम गलनांक का एवं निश्चित क्षमता एवं मोटाई का होना चाहिए। तार की मोटाई जितनी अधिक होगी उसमें प्रवाहित धारा का मान उतना ही अधिक होगा। परिपथ में इसे श्रेणी क्रम में लगाया जाता है।

इलेक्ट्रॉन: इलेक्ट्रॉन या विद्युदणु ऋणात्मक वैद्युत आवेश युक्त मूलभूत उपपरमाणविक कण है। यह परमाणु में नाभिक के चारो ओर चक्कर लगाता हैं। इसका द्रव्यमान सबसे छोटे परमाणु (हाइड्रोजन) से भी हजारगुना कम होता है।

विद्युत्-चुम्बकीय प्रेरण: किसी चालक को किसी परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर उस चालक के सिरों के बीच विद्युतवाहक बल उत्पन्न होने को विद्युत्-चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं। उत्पन्न विद्युत्वाहक बल का मान गणितीय रूप से फैराडे का प्रेरण का नियम द्वारा दिया जाता है। प्रायः माना जाता है कि फैराडे ने ही १८३१ में विद्युतचुम्बकीय प्रेरण की खोज की थी।

विद्युत शक्ति: किसी विद्युत परिपथ में जिस दर से विद्युत उर्जा स्थानान्तरित होती है उसे विद्युत शक्ति कहते हैं। इसका एसआई मात्रक 'वाट' (W) है।

विद्युत परिपथ: विद्युत अवयवों एवं विद्युतयांत्रिक अवयवों का परस्पर संयोजन विद्युत परिपथ अथवा विद्युत परिपथ (नेटवर्क) कहलाता है। 

चालक: वे पदार्थ जो अपने अन्‍दर से आवेश को आसानी से प्रवाहित होने देते है चालक पदार्थ कहलाते है.  सबसे अधिक विद्युत चालक चॉदी फिर उसके बाद क्रमश: तॉंबा ,सोना व एल्‍यूमिनियम की होती है।

कुचालक: वे सभी पदार्थ जो अपने अन्‍दर से आवेश का प्रवाह नही होने देते है कुचालक कहलाते है. जैसे सूखी लकडी, आसुत जल, कॉंच, एबोनाइट, रेशम चीनी ,मिट्टी अधिकांश अधातुऍं।

अर्धचालक:कुछ ऐसे पदार्थ भी होते है जो सामान्‍य परिस्थितियों में आवेश प्रवाहित नही करते लेकिन कुछ बिशेष परिस्थितियेां में जैसे उच्‍चताप अथवा अशुद्धियॅॅाॅ मिलाने पर चालक की तरह व्‍यवहार दर्शाते है तथा आवेश को प्रवाहित करने लगते है ऐसे पदार्थों को अर्धचालक कहते है। जैसे सिलिकान जर्मेनियम कार्बन व सेलेनियम आदि.

अतिचालक: अतिचालक वे पदार्थ होते है जो निम्‍न ताप पर अधिक चालक हो जाते है निम्‍न ताप पर इनका वैद्युत प्रतिरोध बि‍ल्‍कुल न के बराबर हो जाता है और ये बिना किसी ऊर्जा का ह्रास के विद्युत का प्रवाह करने लगते है ।


आज के पोस्ट में विद्युत से जुड़े शब्दों के बारे में जाना जो अक्सर हमारे रोजमर्रा के कामो में उपयोग में आता रहता है और साथ ही विद्युत से जुड़े शब्दों से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न  भी पूछे जाते हैं.

उम्मीद है यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी साबित होगी ,इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें.