Active Study Educational WhatsApp Group Link in India

वन विनाश | विनाश के कारण | वन विनाश से उत्पन्न समस्याएं | उपाय

वन विनाश (forest destruction)

वन विनाश (forest destruction) - विकसित और विकासशील सभी प्रकार के देशों के लिए गंभीर समस्या बनी हुई हैं। आज हम वन विनाश के कारण, वन विनाश के उपाय को जानेंगे। वनों से विविध प्रकार के फल, फूल, लकड़ी, ईंधन, औद्योगिक कच्चे माल आदि प्राप्त होते हैं। साथ ही पारिस्थितिक संतुलन बनाये रखने में वनों का योगदान अमूल्य होता है। 

forest destruction

    वन विनाश किसे कहते हैं? (what is forest destruction)

    "यदि किसी क्षेत्र में वन काटे जाएं किंतु उसी अनुपात में यदि वनों की पुनर्स्थापना एवं विकास नहीं हो तो उसे वन विनाश कहते हैं।"

    बीसवीं शताब्दी में तीव्र औद्योगीकरण, नगरीकरण, कषि भूमि में विस्तार आदि आर्थिक कारणों से वनों की अंधाधुंध कटाई की गयी है जिससे वनों के क्षेत्रफल में निरन्तर कमी होती गयी। 

    वन विनाश के कारण और उपाय | Causes and measures of forest destruction in Hindi

    वन विनाश के कारण क्या-क्या हैं? (Due to forest destruction)

    • वनों का विनाश प्राकतिक और मानवीय दोनों कारणों से होता है - प्राकतिक कारणों से विनष्ट वन कुछ समय पश्चात् प्रायः पुनः उग आते हैं किन्तु मानव द्वारा वनों के काटने और भूमि का उपयोग कषि, आवास, कारखाना, विद्युत संयंत्र आदि के रूप में किये जाने से वन सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। 
    • शुष्क मौसम में वक्षों के परस्पर रगड़ते रहने के कारण वनों में आग लग जाती है जिससे कभी-कभी विस्तत क्षेत्र में वन जल कर नष्ट हो जाते हैं।   
    • कभी-कभी आकाशी बिजली के सम्पर्क में आने से भी वनों में आग लगने से वक्ष जलकर नष्ट हो जाते हैं। 
    • जलवायु संबंधी कारणों से वन वक्षों में रोग लग जाते हैं और वक्ष सूख कर नष्ट हो जाते हैं। 
    • वक्षों की जड़ों, तनों तथा पत्तियों में कई प्रकार के कीटों के लग जाने पर भी समूहों में वक्ष सूख जाते हैं। 
    • वक्षों के विनाश में शाकाहारी जंगली पशुओं का भी हाथ होता है। 
    • उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में स्थानांतरणशील कषि के प्रचलन से वनों को काटकर कषि के लिए प्रति दो-तीन वर्ष के बाद नवीन भूमि प्राप्त की जाती है। 
    • आदिवासियों द्वारा की जाने वाली इस कषि पद्धति के कारण वनों का विनाश होता रहता है। 
    • पूर्वोत्तर भारत और मलाया के पर्वतीय भागों में प्रचलित स्थानांतरणशील कृषि वन विनाश के लिए काफी सीमा तक उत्तरदायी है।
    • जनसंख्या वद्धि निर्वनीकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण है। जनसंख्या में तीव्र वद्धि होने से भोजन,  आवास, यातायात मार्ग आदि की मांगों की पूर्ति के लिए वनों को दीर्घकाल से साफ किया जाता रहा है किन्तु सर्वाधिक वन विनाश की घटनाएं बीसवीं शताब्दी में विशेषकर इसके उत्तरार्द्ध में हुई हैं। संघन जनसंख्या वाले क्षेत्र में वनों का लगभग सफाया हो चुका है।
    • तकनीकी विकास यंत्रीकरण और औद्योगीकरण के विस्तार से लकड़ी की मांग में तीव्र वद्धि हुई है। कागज, लुग्दी तथा अन्य रासायनिक उद्योगों, फर्नीचर निर्माण, भवन निर्माण, रेल डिब्बों आदि के निर्माण के लिए लकड़ी की मांग और मूल्य में वद्धि होने से वनों की अंधाधुंध कटाई की गयी है जिससे निर्वनीकरण अधिक तेजी से हुआ और अनेक प्रकार की आर्थिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।
    • नगरों के विस्तार या नवीन नगरों को बसाने के लिए कारखानों तथा विद्युत संयंत्रों की स्थापना एवं विशाल जलाशयों के निर्माण आदि के उद्देश्य से वन भूमि को साफ करने से होने वाला निर्वनीकरण-वर्तमान समय की प्रमुख घटना है।

    Read: ज्वलामुखी के बारे में जाने

    वन-विनाश से उत्पन्न समस्याएं (problems caused by deforestation)

    • वनों के विनाश से अनेक प्रकार की आर्थिक, भौगोलिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जिनमें प्रमुख हैं - मदा अपरदन, जल भण्डार में कमी, बाढ़ तथा सूखे की आवत्ति एवं तीव्रता में वद्धि, वर्षा में कमी, पर्यावरणीय असंतुलन, हरितगह प्रभाव की तीव्रता आदि। 
    • इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है - 
    • अधिक वर्षा वाले प्रदेशों में वन हास से भूतल की नग्न चट्टानों पर तेज वर्षा बूंदों के प्रहार तथा तेज धरातली जल प्रवाह से मदा अपरदन तीव्र हो जाता है और ऊपरी सतह की उर्वरा मिट्टी बहकर अन्यत्र चली जाती है। इससे भूमि अनुपजाऊ हो जाती है। 
    • वक्षों की जड़ें जल प्रवाह को रोकती हैं जिससे वर्षा का जल रिस कर नीचे जाता है और भूमिगत जलभण्डार एवं जल स्तर में वद्धि होती है। वनों के हास से भूमि में जल का रिसाव कम होने के कारण भौम जल स्तर नीचे चला पाता है।
    • वनों के कट जाने पर धरातली जल अबाध रूप से प्रभावित होता है और अपरदित अवसाद भार का नदियों की तली पर जमाव होता रहता है। अत्यधिक मात्रा में एक साथ जल नदियों में पहुँचने पर भंयकर बाढ़े आती है जिससे अधिक जन-धन की क्षति होती है। 
    • वनों के ऊपरी वितान आई बादलों (जल बूंदों) को रोककर वर्षा की मात्रा में वद्धि करने में सहायक होते हैं। वन विनाश के कारण सूखे की आवत्ति और मात्रा दोनों में वद्धि देखने को मिलती है। 
    • अर्द्ध शुष्क प्रदेशों में वनस्पतियों के विनाश से वायु अपरदन और मरूस्थलों के विस्तार में वद्धि होती है। 
    • वनों के विनाश से जैव विविधता में कमी आती है और अनेक जंगली पशु एवं जीव समाप्त और विलुप्त हो जाते हैं। प्राकतिक आवासों के विनाश के कारण पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। 
    • वन मानवजन्य (मुख्यतः कारखानों से निकलने वाली) कार्बन डाई-आक्साइड को सोख लेते हैं और वायुमंडल के हरितगह प्रभाव को कम करते हैं। वनों के अभाव में वायुमण्डल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा में वद्धि होती हैं। इससे तापमान में वद्धि होने से वायुमण्डलीय ऊष्मा संतुलन बिगड़ जाता है और पर्यावरणीय समस्याए बढ़ती जाती हैं।

    वन संरक्षण के उपाय (Forest Conservation Measures)

    • वन संरक्षण' का तात्पर्य वनों को दुरूपयोग, निर्वनीकरण तथा क्षति से बचाना है। 
    • किसी देश या प्रदेश के अबाध आर्थिक विकास तथा पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखने के लिए वन सम्पदा की रक्षा और संरक्षण वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। 
    • वन संरक्षण से वन सम्पदा वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य में भी अक्षुण्ण बनी रहती है और उससे निरन्तर लाभ प्राप्त होता रहता है। 

    वन संरक्षण के कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं -

    1. चयनात्मक कटाई (selective harvesting) –

    वनों की सामूहिक कटाई के स्थान पर चयनात्मक कटाई की जानी चाहिए। वन के केवल उन्हीं वक्षों को काटा जाना चाहिए जो परिपक्व तथा काटने योग्य हों। नये छोटे और अपरिपक्व पौधों एवं वक्षों को बचाना आवश्यक होता है क्योंकि वे अग्रिम समय में बढ़कर अधिक उपयोगी बन सकते हैं। कभी-कभी वन की सघनता को कम करने के लिए नये पेड़-पौधों को काटना भी आवश्यक होता है। वक्षों की चयनात्मक कटाई वन संरक्षण की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और कारगर उपाय मानी जाती है। .

    2. वन नीति (forest policy) – 

    वनों के समुचित प्रबंधन तथा संरक्षण के लिए प्रभावी वन-नीति की आवश्यकता होती है। कई विकसित एवं विकासशील देशों की भाँति भारत की भी राष्ट्रीय वन नीति है। वन नीति में वन काटने पर पूर्ण रोक. वनाग्नि की रोकथाम, निर्वनीकरण से उत्पन्न समस्याओं और हानियों के प्रति जन जागरण उत्पन्न करना, सामाजिक वानकी आदि के रूप में नये वनों का रोपण, पेड़ों का रोगों तथा कीटाणुओं से बचाव. वनों के अनावश्यक कटाई पर रोक, स्थानांतरणशील कषि पर रोक, वन्य जीवों की पूर्ण सुरक्षा आदि पक्षों को सम्मिलित किया जाता है। 

    वन नीति का कठोरता से पालन हो, इसके लिए प्रशासनों और सरकारी एजेन्सियों की सक्रियता तथा जनसहयोग आवश्यक है। 

    3. वन रोपण (forest plantation) – 

    वन संरक्षण का प्रथम सूत्र है कि वनों को काटकर वन भूमि का अन्य भूमि उपयोगों (यथा कषि, अधिवास, आदि) में प्रयोग न किया जाय। किन्तु विद्युत संयंत्रों, जलाशयों, सड़कों, कारखानों, भवन निर्माण आदि के लिए अनेक बार वनों को काट कर भूमि प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है। सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल से वनाच्छादित भूमि के न्यूनतम अनुपात (33%) को बनाये रखने के लिए नये स्थानों पर विशेषतः बेकार पड़ी बंजर भूमि. रेलमार्गों एवं सड़कों के किनारे और वन-विनाश से उत्पन्न वक्ष रहित क्षेत्रों में वन रोपण करके निर्वनीकरण से होने वाली हानि की क्षतिपूर्ति की जा सकती है। .

    4. जन चेतना (public consciousness) –

    सरकारी नियमों तथा कानूनों का अनेक बार सरकारी तंत्र और निजी ठेकेदारों द्वारा उल्लंघन किया जाता है जिससे वन सम्पदा और वनों की काफी क्षति होती है। अतः वन विनाश की रोकथाम के लिए आवश्यक हो जाता है कि स्थानीय जनता को वन-विनाश से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया जाय। उत्तरांचल में सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतत्त्व में चलाया गया चिपको आन्दोलन (1973) रेनी ग्राम (चमोली) की महिलाओं की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का उत्कष्ट उदाहरण है। ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर ठेकेदारों द्वारा पेड़ों की कटाई का डटकर विरोध किया और पेड़ों को नहीं काटने दिया। 

    5. पारिस्थितिक दष्टिकोण (ecological approach) -

    पारिस्थितिक दष्टिकोण से जैव विविधता अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। अतः किसी क्षेत्र में वन रोपण के समय कई जातियों के वक्षों का रोपण करना अधिक लाभकारी होता है। इसके साथ ही वन रोपण के लिए पौधों का चयन आर्थिक या व्यापारिक महत्त्व के स्थान पर पारिस्थितिक महत्त्व के अनुसार किया जाना चाहिए। रोपण के लिए पौध प्रजातियों का चयन पर्यावरणीय दशाओं (जलवायु. मिट्टी आदि) और स्थानीय निवासियों की आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए। भारत चलाये गये विभिन्न कार्यक्रमों-सामाजिक वानिकी, कषि वानिकी, सामूहिक वानिकी आदि में इन दष्टिकोणों को अपनाया गया है।

    Active Study Educational WhatsApp Group Link in India

    यूट्यूब चैनल देखने के लिए – क्लिक करें

    Share -